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कर्म माने क्या है? Sadhguru ने बताया कर्म का असली विज्ञान

कर्म माने क्या है? Sadhguru ने बताया कर्म का असली विज्ञान

Karma Ka Kya Matlab Hai? by Sadhguru
Karma Ka Kya Matlab Hai? by Sadhguru

राधे राधे दोस्तों, www.learningforlife.cc में आपका स्वागत है। अक्सर हम गुरु जनो को कहते सुनते है कि अच्छे कर्मो का फल अच्छा होता है और बुरे कर्मों का फल बुरा होता है। लेकिन जिन कर्मो की बात हो रही है आखिर वे होते क्या है, कर्म का मतलब क्या है, इस विषय पर कई लोग उलझन में हैं। इस पोस्ट में हम जानेंगे कि वास्तव में कर्म किसे कहते हैं?

मूल रूप से कर्म का मतलब है क्रिया। यह क्रिया चार प्रकार से होती है-शरीर की क्रिया, मन की क्रिया, भावना की क्रिया, ऊर्जा की क्रिया। ऊर्जा की क्रिया आपके निर्णय की प्रतीक्षा नहीं करती, हर क्षण वह चलती रहती है।

दूसरे दृष्टिकोण से देखने पर कर्म जो है, आपकी स्मृतियों का संचय है। आपके शरीर की हर कोशिका में अद्भुत स्मरण-शक्ति है। लाखों वर्षों की यादों को वह ढो रही है। आपकी त्वचा का रंग, आपके चेहरे का रूप-आकार, आपका कद सब कुछ यादों का संचय ही है। आपके पुरखे कैसे दिखते थे, कैसे जीते थे इत्यादि यादें जो दर्ज हुई हैं, उनकी नींव पर ही कर्म आपके जीवन को चला रहा है।

आपके पुरखों की शक्ल-सूरत से संबंधित उसी याद ने आपकी परदादी की जैसी नाक आपको दे रखी है। आप जिस देश में रहते हैं उसकी जलवायु भी आपकी त्वचा के रंग को तय करती है। स्थान-परिवर्तन करके दूसरे देश की जलवायु में रहने पर भी नए प्रदेश के अनुरूप त्वचा का रंग आपको मिलने के लिए पुरानी यादें का खत्म होना जरूरी है। इसमें कम से कम लाखों वर्ष लग जाएँगे। स्मृतियों का प्रभाव उस हद तक आपको नियंत्रित किये हुए है।

यादों से मुक्त नहीं होंगे तो जीवन एक ही तरीके से एक वृत्त में फँसकर गोल-गोल घूमता रहेगा। आगे बढ़ने का रास्ता उसे नहीं सूझेगा। यदि अभी भी आपके पाषाण-युग के पुरखे अपने लालच के अनुसार आपकी ज़िंदगी को चला रहे हों तो आप अपने विशिष्ट जीवन को कब जीकर देखेंगे?

इसी बात को अंग्रेज़ी में कहते हैं 'मृतकों को मृतक ही रहने दें।' उन्हें मरने दें तभी आपका जीवन पूर्ण रूप से खिल सकता है, नए अवसर खुल सकते हैं। लेकिन वे लोग इतनी जल्दी आपसे हटेंगे नहीं। उनको कम कर के न आंकें।

यदि आप लगातार कुछ आध्यात्मिक साधनाएं करते रहेंगे तो आप गौर करेंगे कि उन स्मृतियों और आपके बीच में एक अंतराल पैदा करना संभव हो रहा है। आप महसूस करेंगे कि आपके व्यक्तित्व में एक नया निखार आ रहा है।

अगर कोई संन्यास लेने का निर्णय ले, तो उन्हें अपने पुरखों तथा माता-पिता का अंतिम संस्कार संपन्न करना पड़ता है। भले ही उनमें से कोई जीवित हो, पर फिर भी यह अनुष्ठान संपन्न होगा ही। इसका मतलब यह नहीं कि वे उनकी मृत्यु की कामना कर रहे हैं। मतलब यही है कि वे उनकी स्मृतियों को पूर्ण रूप से काट रहे हैं।

आपका शरीर ही नहीं, बुद्धि भी स्मृतियों का संचय है। उन स्मृतियों को संजो कर जो दूसरों के लिए अज्ञात हैं, अपने को उनके सामने बुद्धिमान दिखाना संभव होता है। इसी सुविधा के चलते आज बहुत से स्कूली शिक्षकों की जीविका चल रही है।

नई ज़िंदगी जीने के लिए ही और बुद्धि आवश्यक होती है। एक ही तरह की ज़िंदगी जीने के लिए यादें काफी होती हैं। अनेक कार्यालयों में यही चल रहा है।

दरअसल जब चेतना मंद रहती है बुद्धिहीनता के किसी काम को बार-बार करना सरल होता है।

एक बार रूस में, काम करने में मंद दिख रहे एक मज़दूर को कारखाने के निरीक्षक ने अपने पास बुलाया।

“वोडका का एक घूँट पीने पर क्या तुम लगातार काम कर सकते हो?"

“मेरे ख्याल में, हाँ।”

“पाँच घूँट पीने पर?”

“क्यों, किसलिए? अभी भी तो मैं काम कर ही रहा हूँ।”

इसी तरह लाखों घूँट वोडका पिये व्यक्ति की तरह आप भी एक ही तरीके से बार-बार कार्यरत रहते हैं। इसी का नाम है कर्म।

कोल्हू में बंधा बैल जिस तरह घूमता रहता है आप भी बार- बार घूम रहे हैं। बालपन में खेल, तरुणाई में प्यार व मोह, चालीस वर्ष की आयु पार करने पर असमंजस से भरी मनोदशा, साठ साल के होने पर, 'क्या हो रहा है मेरे साथ? किसलिए यह ज़िंदगी?' ऐसे सवाल। इस स्थिति को कुछ लोग अध्यात्म समझते हैं। यह अध्यात्म नहीं है, यह तो गोल-गोल घूमना है, चक्कर काटने की प्रक्रिया है।

इसी तरह आपके किसी पुरखे का पहिया आपके माध्यम से घूम रहा है।

अपने दादा-परदादा और माँ-बाप को आपके माध्यम से जीने की अनुमति दिये बिना, एक नई-ताजी जान की तरह, एक नई संभावना की तरह अपनी ज़िंदगी को स्वयं जीना ही अध्यात्म है... हाँ यही अध्यात्म है... इस चक्र को तोड़ना ही अध्यात्म है।

वृत्तों में गोल-गोल घूमते हुए आप आगे की ओर नहीं सरकेंगे। वृत्तों में घूमने का यही मतलब है कि आप कहीं भी पहुँचे बिना एक ही जगह ठहरे हुए हैं।

'पुनरपि जनमम्, पुनरपि मरणम्' के अंतहीन चक्कर में फँसने से क्या फायदा मिलने वाला है?

इसमें यही बात आपके अनुकूल है कि आप हर चक्कर के दौरान पिछले चक्कर को भूल जाते हैं। यदि उसका स्मरण होता तो आप स्वयं को मूर्ख महसूस करेंगे। सैकड़ों बार यही चक्कर, और हर चक्कर में एक ही काम को दुहराते हुए हर बार उस काम में नएपन का पुलक अनुभव कर रहे हैं। यदि यह बात समझ में आ जाए तो अपने को मूर्खाधिराज महसूस करेंगे न?

ये स्मृतियाँ किश्तों में आती हैं, पूरी तरह से नहीं खुलती। स्मृतियों का यह संचय दो में बँटकर आपके जीवन को चलाता है। इसी को संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म कहते हैं। स्मृतियाँ यदि समग्र रूप से एक ही झोंके में आएँ तो आप फौरन उनसे मुक्ति पा लेंगे। क्योंकि उसी काम को बारंबार करने के लिए निश्चित रूप से आप तैयार नहीं होंगे। इस बेवकूफी से निपटकर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि हज़ारों बार उसी वृत्त पर यात्रा करने के बावजूद, स्मृतियों को भुला देने की वजह से; उसे नया अनुभव मान लेते हैं।

अमेरिका में वृद्धों के एक अस्पताल में नब्बे साल की एक बुढ़िया के बारे में मित्रों ने बताया। अल्ज़ाइमर नामक विस्मृति- रोग से पीड़ित वह बुढ़िया अपनी ज़्यादातर स्मृतियों को भूलकर व्हील-चेयर में ज़िंदा है। एकाएक बीच-बीच में उसके अंदर अपने यौवन-काल की यादें फूट पड़ती हैं। उस समय कोई पुरुष उधर से गुजरे तो उसका चेहरा लज्जा से लाल हो उठता और अपने को खूबसूरत दिखाने के लिए वह अपने बालों को संवारने लगती है। शारीरिक दृष्टि से उसके अंदर यौवन की वह इच्छा तो इस समय नहीं है। फिर भी स्मृतियों का प्रभाव उसकी क्रियाओं को उलझन में डालता है।

स्मृतियों का प्रभाव जब तीव्र होता है, आप उसके अनुरूप शरीर का चयन कर लेते हैं, इसीलिए जन्मों का सिलसिला जारी रहता है। उसके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप हर बार उस में फँस जाएँ।

प्रकृति आप के लिए हर बार एक कंटिया सामने रखती है। लेकिन आवश्यक नहीं है कि आप मछली की तरह उसमें फँस जाएँ।

अब सवाल है कि अच्छा कर्म कौन-सा है? बुरा कर्म कौन-सा है।

प्रत्येक क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है। आपकी क्रिया का परिणाम चाहे कैसा भी हो, यदि आप उसे सहर्ष स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाएँ तो सवाल ही नहीं उठेगा कि वह अच्छा है या बुरा। कर्म-बंधन के बारे में कोई चिंता नहीं रहेगी।

फिर पाप और पुण्य तो स्वर्ग के बारे में बोलने वालों द्वारा प्रयोग किए गए शब्द हैं।

प्रकृति जो है, न कठोर है न करुणामयी है। अच्छाई बुराई ये सब मनुष्य के दृष्टिकोण मात्र हैं।

यह पर्वत अच्छा है या बुरा? ' अहा, पर्वत कितना अद्भुत- अनोखा है!' ठीक है, पहाड़ की चोटी पर चढ़ कर नीचे कूद कर देखिए। 'हाय, अनोखे पर्वत पर क्रूर विपदा घट गई है।' कोई भी चीज़ न अनोखी है, न क्रूर। वह जैसा है, उसी तरह है। ज़िंदगी में सब कुछ वैसा ही है।

स्मृतियों के प्रभाव से उठने वाली पक्षपातपूर्ण प्रवृत्ति कुछ बातों को अच्छी और कुछ बातों को बुरी के रूप में आपको दिखाती है। यही आपका कर्म है।

अर्थात् आपके कर्म का मतलब आपके कार्य हैं। बस आप ही के कार्य ! उसे रूप देने वाले आप हैं। केवल आप। आपका कर्म आपका ही कार्य है। आपका प्रत्येक अनुभव आपका ही कार्य है।

कर्म से मतलब आपका भाग्य नहीं है। उसे आपने ऐसा बना लिया। आपकी किस्मत भी आप ही का सृजन है, इस बात को समझ लें तो कर्म आपको फँसाने वाली कोई चीज़ न होकर आपको मुक्त करने वाली चीज़ के रूप में बदल जाएगा। निश्चित रूप से आप को इसे समझ लेना चाहिए। जब आपने इसे समझ लिया, 'यह मेरा ही कार्य है' ऐसी समझ आने के बाद आप जीवन के चक्र में नहीं फँसेंगे। फँस जाने का भय जब नहीं रहे, हर क्षण सौ फीसदी पूर्णता से काम में लग जाएँगे। तब आपका जीवन आपके इच्छानुसार चलेगा।

हर कार्य में पूर्ण रूप से लग जाने पर आप संपूर्ण जीवन के रूप में काम करेंगे। लगन के बिना जीवन जड़-तुल्य है न?

आपकी स्मृतियाँ आपके पक्षपातपूर्ण निर्णय ही हैं। कर्म से मतलब यही है कि आप रंगीन चश्मे से देख रहे हैं। अगर आप रंगीन चश्मे से देखेंगे तो उनका असली रंग आपको कैसे दिखेगा ?

कोई आईना आपके संपूर्ण बिंब को दिखाता है। आपके हटने के बाद भी यदि वह बिंब वहीं चिपका रहे तो कैसा रहेगा? उस आईने से होकर गुजरने वाले सभी के बिंब वैसे ही एक के ऊपर एक वहीं चिपके रहें तो उस आईने की स्थिति कैसी होगी?

कर्म जो है आईने में बिंबों को चिपकाने वाली वह गोंद है। वह अच्छा भी नहीं, बुरा भी नहीं। आपको अपने शरीर के साथ बाँध कर पकड़े रखने वाला आपका कर्म ही है। सवाल यही है कि क्या यह आपकी जागरूकता के चलते घटित हुआ है या संयोग से हुआ है।

अपने पूरे बदन में एक तरह की गोंद चिपका कर आप इस संसार में विचरण कर रहे हैं। आप जिस वस्तु को भी स्पर्श करें, यदि वह आपके बदन से चिपक जाए तो आप क्या बनेंगे? बहुत ही कम समय में पहाड़ की तरह बन जाएँगे। उस बोझ को ढोते हुए चलना कितना कठिन होगा? आपकी स्मृतियाँ इसी तरह पहाड़ से भी ज़्यादा भारी होकर आपको दबोचती हैं। आप उन्हें ढोते हुए काम करने की कोशिश करते हैं। आप इसके प्रति जागरूक हों या न हों, आपके शरीर की हर कोशिका अपने द्वारा बसर किये हरेक पल की यादों को उसी प्रकार ढोती है।

आप कहेंगे, इन बातों को अभी तक किसी ने नहीं बताया। हर पल जीवन इसी बात को आपके सिर पर ठोक-ठोक कर बताता रहता है। आप तो पड़ोसियों की बातचीत और अपनी स्मृतियों के संवाद को ही सदा सुनते रहते हैं। लेकिन ज़िंदगी की आवाज़ पर कहाँ कान देते हैं?

इसके लिए उपदेशों की आवश्यकता नहीं है। पवित्र ग्रंथों की ज़रूरत नहीं है। ज़िंदगी की आवाज़ को सुनें, यही काफी है, स्पष्ट रूप से बात समझ में आ जाएगी। कर्म जो है, एक बहुत बड़े शोर की तरह है। लेकिन वह बाहर से नहीं आ रहा है, भीतर से आ रहा है। इसलिए उस पर ध्यान देने से चूक जाते हैं।

कर्म जो है आपकी जीविका है। वह आपको बाँधने वाली बेड़ी है। यदि उसका ठीक तरह से निर्वाह करें, तो उससे मुक्त होकर आजाद हो सकते हैं।

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